गंगा को घाट से अलग कर पाया है कोई |



बेरहम होते जा रहे हो ?
जानबूझ कर सताए जा रहे हो ?
१० दिन कह कर २२ दिन गुज़र गए
इन दिनों के साथ कहीं दिल में जगह तो कम न हो गए ?
खुद को खो कर भी
लगता है, तुम्हें ना भुला पाऊँगी कभी
तुम्हारी बातें याद है मुझे आज भी
की भला
” गंगा को घाट से अलग कर पाया है कोई ”
तो अब बताओ की
दुनिया इधर की उधर हो जाए
दो दिन रूठ पाया है कोई ?
जाने कितना भी कठोर और सख्त बन जाओ
दो पल बात करते ही यूँ पिघल नहीं जाते ?
तुम्हारी एक मुस्कुराहट देख मेरे आंसू रुक नहीं जाते ?
तुम्हे देखते ही दिल नरम हो जाता है
सब कुछ भूल जाता है
तुम्हे मनाने लगता है
ये भी याद नहीं रहता कि नाराज तो मैं थी
रूठने की बारी अब मेरी है
लेकिन तुम्हारे आगे चलती कहाँ मेरी है


कितना अजीब है
किनारे ठहरे रहते है और धारा बहती जाती है
सब कुछ मालूम होते हुए भी हम आँखें मूँद लेते है
झूठ को सच मान लेते है
फिर ऐसे ही जीवन की कहानी चलती जाती है


कैसे दूर होते जा रहे हो
क्या अब भी सता रहे हो ?
दिन बढ़ते जा रहे है
और नज़दीकियाँ कम होती जा रही है ?
जो खोया था वो कहाँ गया ?
जो लौट कर आया है वो मेरा कहाँ है !
धारा बदल गयी किनारे वहीँ रह गए
समय की दौड़ में
सारे अफसाने बह गए भीड़ में
तुम वो हो क्या ?
मैं ही वो कहाँ हूँ !
गंगा घाट की तलाश में तमस की ओर बह गयी
घाट अपने दायरे में कहीं खो गया
रेत के फासले बढ़ते गए
दरिया सिमटता गया
कोई एक हो कर भी दूर रह गए
कोई पास आने के डर से दूर हो गया
कोई मन की बातों के डर से दूर रह गया



27th June, 2019


निराकार दर्द



दरवाजे खोले
और बंद भी कर दिए
वो मेरे हुए और अधूरे रह भी गए
चोट तो नहीं लगी
बस निराकार दर्द होता गया
बढ़ता रहा

कांच, मिट्टी, लकड़ी, पत्थर
जो उनके पास था मेरा
जो मेरे पास था उनका
वो सब छोड़ गए
समुद्र के बीच मरने को ?
तनहा इमारतों के जंगल में
ज़हर माँगा था
लाये भी नहीं
१० दिन और बोल कर
अलविदा ही कर दिया

ये दिल तो गिड़गिड़ाने को भी तैयार है
कह रहा है लौट आओ
तुम जो कहोगे में वो करूंगी
सब कुछ करुँगी
तुम लौट आओ
कैसे समझाऊं इसे
वो अब किसी और जहान में चले गए
अब इंतज़ार अधूरा ही रहेगा जीवन भर
उनको तुम दिखे ही नहीं
तुम्हारा निराकार दर्द महसूस ही नहीं हुआ

13th June, 2019

The dead Poetess


With every vibration, beep or ring tone
My heart took his name and skipped a tombstone
The texts, mails or calls from his side were still none !

If it were the era of letters, postcards and telegram
I would have surely made 100 up and downs to the post office creating alarm

Its not my era
But still an era of separation and wait
Where acting indifferent and neutral
Is more acceptable than making hue and cry
And sharing depressing mental state

Counting hours and days

And I just wrote till this line
With so much hope in the eyes
And lots of memories mixed in my wine
Thinking of all the beautiful things I would do
Thinking of the giggle and marks across his skin
Thinking of the warmth of our hug
Thinking of those beautiful curtains I just bought
Thinking of how I am so much of him
And how he is so much of me
When I got pinched
And so my dream was cut over
There wasn’t any Prince charming
It wasn’t him
And from now on
Its not even me
I am dead
The dead poetess

– half on 12th
– half on 13th June, 2019



I don’t want to recover
I want to die drenched in pain and suffering
I want to die suffocating in his love

I don’t want to eat and sleep
No no , I want to sleep
Because lately it gave me peace
I saw I was coming from a relative’s home from Madhya Pradesh
Though I have no relative there in reality
And I met a guy in the last mini bus
Heading towards the railway station
He sat besides me
I got the vibes of perfect care
Then I peeped out of the window
and saw some beautiful architectures
purple building, long flyover, things I saw in a TV series
Its the capital city of Bengal he said
It was suddenly West Bengal
How come I saw all those things from the window of a mini bus in Madhya Pradesh ?
Which was heading towards its Central Railway Station
I don’t know that
Hallucination ? The third level?
I don’t know
But what made me a bit happy was that guy
When the bus halted for some tea and snacks
He took me out with him
Told me his story
He too was running away
I was running away from the suffocation
What was he running away from ?
Love in his heart
Or hearts in his love ?

I woke up right there
Could not see what happened next
I tried to sleep again to continue that dream
For next 6 hours , but could not find him anywhere !

And when I picked up my cell
It was an ugly text
Pushing me off the cliff
The real world was sadder than my dream
I don’t want to say anything
I don’t want this voidness
In my head, heart and even stomach

14th June, 2019

You are my summer and I am your spring



Besides every odd that exists
Most beautiful thing that happened to me
Is you !
And the treasure of our bond
That disagreed to cease
I don’t know how my laughter
Gives you super energy
But can’t help accepting
That your does the same to me


you are my summer
And I am your spring
If something isn’t important
who comes down 300Kms running?
That too at the 11th hour call?
Friend, that’s all ?
When its highly improbable
When the night is down and the day has ceased
When stuck in all papers and prints
Making long jumps and sprints


Who would want to lose this?
This kind of love
Where one travels double just to make sure
The other is safe and sound in her native shore
I can’t afford this loss
No matter how complex goes the chaos


But my heart also melts
When she counts the 3 consecutive year
And remind me of the spoon he didn’t share
He customised our life
Blurred me in her
And her in mine
He never shut the door
And Never opened the windows of his heart
Guilt, happiness, confusion all he carried in one cart
I failed as an outlet
When He couldn’t approach my gate
I failed as a lover
When he chose to stick by her


And this kind of love
I failed to understand
Why he came to me
When his strings were attached to her?
Why did he go back to her
When I was there for him to infinity & forever
And knowing all now
I failed to give up
I am sacred of losing this treasure
I am sinking in the pool of isolation
And still afraid to lose the thread he is holding with the knots of my hooks
And it’s some endless pain it looks
10th June, 2019

दो रास्ते राह देख रहे हैं कबसे



पत्थर से तो नहीं बना फिर ये दिल इतना सेह कैसे जाता है ?
नफरत क्यों नहीं होती है, ये प्यार कहाँ से आता है ?
मैं जानती हूँ मैं मंज़िल नहीं
उसके रस्ते मेरी तरफ आते ही नहीं
फिर भी खुद को बर्बाद करने के लिए तैयार हूँ मैं
जो वादे किये उनको निभाने आई हूं मैं |

प्यार और फ़र्ज़ के बीच कौन जीतेगा
ये तो सारा जग जानता है
मैं फिर भी दलील दे रही हूँ
हारी हुई ज़िन्दगी में जीत भर रही हूँ
उसको लड़ने का हौसला दे रही हूँ
ये जानते हुए की
मेरी हार उससे ही है
जो मेरा संसार उसके हिस्से है
फिर भी आँचल खोल कर वो सब बाँट रही हूँ
जो थोड़ा सा सुख मेरे हिस्से है

मैं तो वो बदनसीब प्यार हूँ
जो बस देख कर रोयेगा
कैसे जिंदगी भर फर्ज़ को ढोया जाएगा
कब बोलोगे क्या चाहते हो
जब सब कुछ बिखर जायेगा ?
फैसला क्यों नहीं लिया जाता तुमसे
कितने साल लगेंगे और ?
क्यों नहीं दिखता दो रास्ते
राह देख रहे हैं कबसे !!

तुम छोड़ जाओगे
तो तुम्हारे घर की दीवारों से बातें करने आऊंगी
उनसे पूछने आउंगी
वो सारे सवाल
जिनके जवाब तुमसे चाहिए था मुझे
उनके कंधे पर सर रख कर रोउंगी
उनको छूकर तुम्हे महसूस करूंगी
तुम्हे उस सन्नाटे में ढूंढूंगी
हमारी हंसी तो गूंजती होगी वहां ?
होली के रंग भी बिखरे होंगे ?
सब समेट लाउंगी
तुम्हारे लिए खुद को बर्बाद कर लुंगी
और कहीं खो जाउंगी

मैं तो बस एक एहसास हूँ
मुझे बस जिया जाता है
ज़िन्दगी भर ढोया नहीं जाता
शीशे की बोतल में बंद करके काश ले जाये कोई
देख कर सामने पछताने के लिए ही सही
कागज़ के खत की तरह
मरोड़ कर फेंक न देना
बरसात होगी तो बारिश बन जाउंगी
टूट कर मिट्टी में मिल जाउंगी
तुम्हारा हिस्सा थी मैं
इस हिस्से को लेकर अब कहाँ जाऊँगी मैं ?

10th June, 2019